Once a village, now barren land: नेपाल से यमन तक उजड़ते गाँव की कहानी
नेपाल में त्रिशूली नदी की बाढ़ ने बस्तियां उजाड़ दीं, वहीं यमन में 19 साल बाद बंजर ज़मीन हरी हुई। जानिए कुदरत और इंसान के बीच चल रही इस जंग की पूरी रिपोर्ट।
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नेपाल के रसुवा जिले में त्रिशूली नदी की बाढ़ ने साणो बरखू गाँव का नामोनिशान मिटा दिया है। हिमालय की गोद में बसा यह इलाका अब किसी कब्रिस्तान जैसा प्रतीत होता है। ग्लेशियर टूटने से आई इस भीषण आपदा ने तिमुरे और स्याप्रु बेसी (Syfrubesi) जैसे जीवंत व्यापारिक केंद्रों को मलबे के ढेर में बदल दिया है। वेंटोर (Vantor) की सैटेलाइट तस्वीरों ने इस भयावहता को दुनिया के सामने रखा है, जिसमें नेपाल-तिब्बत बॉर्डर क्रॉसिंग का एक बड़ा हिस्सा पानी की प्रचंड लहरों में बहता हुआ साफ दिखाई दे रहा है। जो गाँव कभी रौनक और पर्यटकों से गुलजार रहते थे, वे आज बंजर और वीरान ज़मीन में तब्दील हो चुके हैं। यह कहानी केवल एक आपदा की नहीं है, बल्कि प्रकृति के बदलते मिजाज और इंसानी संघर्ष की भी है।
नेपाल तबाही के आंकड़े
हिमालयी इलाकों में कुदरत का गुस्सा इस बार बेहद विनाशकारी रहा है। बीबीसी की 31 अगस्त 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, त्रिशूली नदी के किनारे स्थित साणो बरखू गाँव के ढलान वाले घर ताश के पत्तों की तरह ढह गए। आपदा का प्रभाव इतना गहरा था कि नदी के तल से 300 मीटर ऊपर तक की वनस्पति और हरियाली पूरी तरह छिल गई है। कीचड़, चट्टान और मलबे का जमाव नदी के मूल जल स्तर से 100 मीटर की ऊंचाई तक देखा गया है, जो इस बाढ़ की भयावहता का प्रमाण है। यह मलबा नदी के ऊपरी प्रवाह (upstream) की ओर 2.5 किलोमीटर तक फैल गया है। [[1]](https://m.netdania.com/news/Once%20a%20village,%20now%20barren%20land%20-%20BBC%20in%20valley%20devastated%20by%20floods/BBC%20Asia/BBCAsia/rssnews/%252Fnews%252Fvideos%252Fc0m3197yxzmo@BBCAsia%7B%22Syms%22%3A%5B%5D%7D/1788175927)
| प्रभावित क्षेत्र | नुकसान का विस्तृत विवरण | वर्तमान जमीनी स्थिति |
|---|---|---|
| तिमुरे (Timure) | खड़ी ढलानों पर बने घर मलबे में समा गए | पूरी तरह से गायब और निर्जन |
| स्याप्रु बेसी | बिजली घर (Hydroelectric station) और पुल तबाह | पत्थरों और मलबे के नीचे दबा क्षेत्र |
| त्रिशूली क्षेत्र | एक पूरा मोहल्ला और मुख्य पुल पानी में बहे | संचार और संपर्क पूरी तरह ठप |
| साणो बरखू | ऊंचे स्थानों से गाँव का दृश्य अब केवल खंडहर है | पूरी तरह से वीरान और खतरनाक |
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस त्रासदी में अब तक सैकड़ों लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 4,200 से अधिक लोग अभी भी लापता हैं। लापता लोगों की इतनी बड़ी संख्या ने राहत और बचाव कार्यों के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। [[2]](https://www.bbc.com/news/articles/cd68vpjv21do)
ग्लेशियर टूटने का कारण
प्लैनेट लैब्स (Planet Labs) की सैटेलाइट तस्वीरों और ड्रोन फुटेज ने इस आपदा की जड़ का खुलासा किया है। तिब्बत की तरफ एक विशाल ग्लेशियर का हिस्सा टूटकर नदी में गिरने से 'फ्लैश फ्लड' की स्थिति पैदा हुई। इस घटना ने नदी के बहाव को अचानक कई गुना बढ़ा दिया। चीन के अधिकारियों ने शुरुआती घंटों में ही चेतावनी दी थी कि वहां एक अस्थाई झील (Barrier Lake) बन गई है, जो फूटने पर निचले इलाकों में भारी तबाही मचा सकती है।
हालांकि, भूविज्ञानी डॉ. अर्घा बनर्जी ने इस पर थोड़ा अलग दृष्टिकोण साझा किया है। उनके अनुसार, हालांकि पानी का प्रवाह जारी था, लेकिन झील का सतही क्षेत्रफल बहुत तेज़ी से नहीं बढ़ा। ड्रोन फुटेज में एक निकासी चैनल (Drainage channel) भी दिखाई दिया, जिससे संकेत मिलता है कि पानी का आयतन फिलहाल अलार्मिंग स्तर पर नहीं पहुँचा है। इसके बावजूद, नदी के किनारे बसे गाँवों के लिए खतरा अभी टला नहीं है क्योंकि मिट्टी और मलबे का दबाव किसी भी समय नए भूस्खलन को जन्म दे सकता है।
यमन में लौटी हरियाली
जहाँ नेपाल प्रकृति के कहर से जूझ रहा है, वहीं यमन के अल-घरेगा (Al-Gharegah) गाँव से एक उम्मीद जगाने वाली खबर आई है। पिछले 19 वर्षों (लगभग 40 फसल सीजन) से सूखे और टूटे हुए सिंचाई तंत्र के कारण यहाँ की ज़मीन बंजर पड़ी थी। लेकिन 'यमन फूड सिक्योरिटी रिस्पांस एंड रेजिलिएंस प्रोजेक्ट' (FSRRP) ने इस बंजर भूमि की किस्मत बदल दी है।
17 जून 2026 को 'विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस' के अवसर पर जारी रिपोर्ट के अनुसार, यहाँ 360 मीटर लंबी एक नई सिंचाई नहर का निर्माण किया गया। इस छोटी सी पहल ने 110 हेक्टेयर बंजर ज़मीन को फिर से उपजाऊ बना दिया है। इस परियोजना ने न केवल 280 किसानों को उनकी आजीविका वापस दी, बल्कि पुनर्वास के दौरान 395 अस्थायी नौकरियां भी पैदा कीं। [[3]](https://unsdg.un.org/latest/stories/barren-bountiful-reviving-farmlands-al-gharegah-village-yemen)
यमन में भूमि सुधार की प्रक्रिया: 1. सफाई: सबसे पहले ज़मीन पर फैली कटीली झाड़ियों और आक्रामक पौधों को हटाया गया। 2. जल बहाली: क्षतिग्रस्त कुओं और सिंचाई नेटवर्कों की मरम्मत की गई। 3. फसल विविधीकरण: शुरुआत में मक्का, बाजरा और ज्वार जैसी मुख्य फसलें लगाई गईं। 4. नया प्रयोग: अब यहाँ के किसान सफलतापूर्वक नींबू, अंगूर और आलू की खेती भी कर रहे हैं।
अरावली पहाड़ी का नया विवाद
भारत में अरावली पहाड़ियों के संरक्षण को लेकर एक नया कानूनी और पर्यावरणीय विवाद खड़ा हो गया है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने 'पहाड़' की एक नई परिभाषा दी है, जिसके तहत कम से कम 100 मीटर ऊंची संरचना को ही पहाड़ माना जाएगा। इसके साथ ही, यदि ऐसी दो पहाड़ियाँ 500 मीटर के दायरे में हों, तो उन्हें 'रेंज' माना जाएगा। [[4]](https://www.facebook.com/groups/TAWMumbai/posts/25222690957400521/)
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का तर्क है कि यह परिभाषा सुरक्षा मानकों को कमजोर करती है। उनका डर है कि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली छोटी पहाड़ियाँ और अरावली की पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण झाड़ियाँ अब माइनिंग माफिया के निशाने पर आ सकती हैं। दूसरी ओर, केंद्र सरकार का दावा है कि इस परिभाषा से नियमों में एकरूपता आएगी और नियमन मजबूत होगा। आंकड़ों के अनुसार, 1.47 लाख वर्ग किमी में फैली अरावली रेंज का केवल 2% हिस्सा ही माइनिंग के लिए संभावित रूप से पात्र है, लेकिन संघर्ष विकास और संरक्षण के बीच बना हुआ है। [[5]](https://www.facebook.com/dolr.mord/posts/understanding-land-records-made-simplelet-us-understand-the-term-waste-land-area/1256191643288202/)
बंजर ज़मीन सुधार के उपाय
महाराष्ट्र के भोर क्षेत्र में नाताम्बी (Natambi) जैसे गाँवों ने उदाहरण पेश किया है कि कैसे सामुदायिक प्रयासों से बंजर भूमि को हरा-भरा किया जा सकता है। 16 मार्च 2026 को भूमि संसाधन विभाग के एक अपडेट के अनुसार, राज्य में 'वेस्ट लैंड एरिया (Non Cultivable) - Class (B)' के रूप में वर्गीकृत ज़मीनों का रिकॉर्ड सुधारा जा रहा है। पेदली (Pedli) जैसे क्षेत्रों में 'फाइकस विरेन' (Ficus viren) जैसे स्थानीय पेड़ों का रोपण किया गया है, जिसने मिट्टी की नमी सोखने की क्षमता को बढ़ाया है। [[6]](https://www.youtube.com/watch?v=KefmGBd7plQ&vl=en)
खेती सुधार के मुख्य चरण एक एकड़ बंजर भूमि को विकसित करने के लिए विशेषज्ञों ने 10 चरणों वाला एक रोडमैप सुझाया है: * चरण 1: जल और ऊर्जा नियोजन - सबसे पहले बोरवेल और सोलर पैनल की व्यवस्था करना ताकि सिंचाई सुनिश्चित हो सके। * चरण 2: लक्ष्य निर्धारण - भूमि का सटीक नक्शा बनाना और उसे अलग-अलग हिस्सों में विभाजित करना। * चरण 3: मिट्टी परीक्षण - मिट्टी की वैज्ञानिक जांच कर उसकी कमियों को दूर करना। * चरण 4: स्मार्ट निवेश - सरकारी सब्सिडी और कृषि योजनाओं का लाभ उठाना। * चरण 5: विस्तार - केवल फसल नहीं, बल्कि पशुधन को जोड़कर आय के स्रोत बढ़ाना। * चरण 6: मूल्य संवर्धन - फसल की प्रोसेसिंग कर उसे बाजार में बेचना। * चरण 7: दक्षता में वृद्धि - नई तकनीकों का उपयोग कर लागत कम करना। * चरण 8: सतत जीवन - कचरे को खाद में बदलना और रासायनिक खादों का प्रयोग कम करना। * चरण 9: कृषि पर्यटन - खेत को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करना। * चरण 10: अंतिम विस्तार - पूरे मॉडल को बड़े पैमाने पर लागू करना।
स्थानीय प्रशासन की महत्वपूर्ण भूमिका
किसी भी क्षेत्र की ज़मीन को बंजर होने से बचाने या उसे पुनर्जीवित करने में स्थानीय प्रशासन की भूमिका सबसे अहम होती है। तहसील और ब्लॉक स्तर पर ज़मीन के रिकॉर्ड में हो रहे बदलावों पर पैनी नज़र रखना आवश्यक है। उदाहरण के तौर पर, गोवा सरकार ने मई 2026 में 56 गाँवों को लेकर एक विशेष सर्कुलर जारी किया था, जिसे लेकर काफी भ्रम की स्थिति पैदा हुई। अंततः भारी विरोध के बाद जून 2026 में इस प्रस्ताव को वापस लेना पड़ा। यह घटना दर्शाती है कि ज़मीन के मालिकाना हक और उसके वर्गीकरण को लेकर जनता अब पहले से कहीं अधिक जागरूक है। [[1]](https://m.netdania.com/news/Once%20a%20village,%20now%20barren%20land%20-%20BBC%20in%20valley%20devastated%20by%20floods/BBC%20Asia/BBCAsia/rssnews/%252Fnews%252Fvideos%252Fc0m3197yxzmo@BBCAsia%7B%22Syms%22%3A%5B%5D%7D/1788175927)
चुनौतियों का समाधान और निष्कर्ष बंजर ज़मीन को फिर से उपजाऊ बनाने में सबसे बड़ी चुनौती पानी की निरंतर उपलब्धता और मिट्टी का कटाव है। नेपाल की त्रासदी हमें सिखाती है कि प्रकृति के सामने मानवीय निर्माण कितने कमज़ोर हैं, वहीं यमन का उदाहरण दिखाता है कि अगर सही तकनीक और इच्छाशक्ति हो, तो 19 साल से सूखी ज़मीन पर भी अंगूर के गुच्छे लटक सकते हैं। भविष्य में ऐसी आपदाओं से बचने के लिए ग्लेशियरों की सैटेलाइट निगरानी और गाँवों के पुनर्वास के लिए वैज्ञानिक मानकों का पालन करना ही एकमात्र रास्ता है।
References
- 1Once a village, now barren land - BBC in valley devastated ...
- 2Nepal flood devastation revealed in satellite imagery
- 3Reviving Farmlands in Al-Gharegah Village, Yemen
- 4Transforming barren land with Ficus viren trees near Pedli ...
- 5Department of Land Resources - Facebook
- 6From Empty Land to Profitable 1 Acre Farm (Step-by-Step) - YouTube
Frequently asked questions
›नेपाल बाढ़ 2026 में कितने लोग लापता हैं?
ताज़ा सरकारी और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के मुताबिक, त्रिशूली नदी में आई इस भीषण बाढ़ और भूस्खलन के बाद 4,200 से ज़्यादा लोग लापता बताए जा रहे हैं, जबकि सैकड़ों लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है।
›त्रिशूली नदी में अचानक बाढ़ आने का मुख्य कारण क्या था?
सैटेलाइट तस्वीरों और विशेषज्ञों के अनुसार, तिब्बत की सीमा की तरफ एक बड़े ग्लेशियर का हिस्सा टूटकर नदी में गिर गया, जिससे अचानक जलस्तर बढ़ गया और भारी तबाही मची।
›यमन के अल-घरेगा गाँव में कितने सालों बाद खेती शुरू हुई?
इस गाँव में सूखे और सिंचाई व्यवस्था ठप होने के कारण पिछले 19 सालों या कहें कि 40 खेती के मौसमों से ज़मीन बंजर थी, जहाँ अब फिर से फसलें लहलहा रही हैं।
›FSRRP प्रोजेक्ट ने यमन में किस तरह मदद की?
इस प्रोजेक्ट के तहत 360 मीटर लंबी सिंचाई नहर का निर्माण किया गया, जिससे 110 हेक्टेयर ज़मीन को पानी मिला। इसने 280 किसानों की मदद की और 395 अस्थाई नौकरियां पैदा कीं।
›अरावली पहाड़ियों के लिए सुप्रीम कोर्ट की नई परिभाषा क्या है?
सुप्रीम कोर्ट के नए मापदंडों के अनुसार, किसी भी ज़मीनी संरचना को 'पहाड़ी' तभी माना जाएगा जब उसकी ऊंचाई कम से कम 100 मीटर हो। दो ऐसी पहाड़ियों के बीच 500 मीटर से कम दूरी होने पर उसे रेंज माना जाएगा।
›अरावली पहाड़ी विवाद पर पर्यावरण कार्यकर्ताओं की क्या चिंता है?
कार्यकर्ताओं का मानना है कि 100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ियों को सुरक्षा के दायरे से बाहर रखने से माइनिंग माफिया को बढ़ावा मिलेगा और पारिस्थितिकी तंत्र को भारी नुकसान पहुंचेगा।
›महाराष्ट्र में बंजर ज़मीन को किस श्रेणी में रखा जाता है?
महाराष्ट्र के लैंड रिकॉर्ड्स के अनुसार, ऐसी ज़मीन जो खेती के योग्य नहीं है, उसे 'वेस्ट लैंड एरिया (नॉन कल्टिवेबल) - क्लास (B)' की श्रेणी में वर्गीकृत किया जाता है।
›बंजर ज़मीन को हरा-भरा करने के लिए पेदली में कौन से पेड़ लगाए गए?
बंजर ज़मीन को फिर से जीवित करने और वन्यजीवों के लिए आवास बनाने के उद्देश्य से पेदली में 'फाइकस विरेन' (Ficus viren) प्रजाति के पेड़ लगाए गए हैं।
›नेपाल में बाढ़ का असर नदी के तल से कितनी ऊंचाई तक देखा गया?
बाढ़ के साथ आए मलबे और कीचड़ ने नदी के तल से 100 मीटर ऊपर तक के इलाकों को प्रभावित किया और ढलानों पर बनी बस्तियों को भारी नुकसान पहुँचाया।
›गोवा सरकार ने जून 2026 में कौन सा फैसला वापस लिया?
गोवा सरकार ने राज्य के 56 गाँवों को लेकर एक विशेष सर्कुलर जारी किया था, लेकिन स्थानीय विरोध और विवाद के कारण उसे जून 2026 में वापस ले लिया गया।
Sources referenced
- Once a village, now barren land - BBC in valley devastated ...
- Nepal flood devastation revealed in satellite imagery
- Reviving Farmlands in Al-Gharegah Village, Yemen
- Transforming barren land with Ficus viren trees near Pedli ...
- Department of Land Resources - Facebook
- From Empty Land to Profitable 1 Acre Farm (Step-by-Step) - YouTube
- Why India's Aravalli hills are at the centre of growing protests - BBC
- Parali has never been the problem. The problem is that no one built a ...

